
दहेज हत्या के दोषी है बलजिंदर सिंह, आप्रेशन सिंदूर का हिस्सा रहने पर मांग रहा था सरेंडर में छूट
अमृतसर, 25 जून (सुरिंदर)। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के दोषी आप्रेशन सिंदूर में शामिल रहे पंजाब पुलिस के ब्लैक कैट कमांडों बलजिंदर सिंह को सरेंडर में छूट देने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि आप्रेशन सिंदूर में शामिल रहने पर उसे हत्या करने की छूट नहीं मिल जाती। बलजिंदर सिंह ने यह अपील पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ की थी, जिसमें उसकी 10 साल की सजा बरकरार रखी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यह कोई सामान्य मामला नहीं है, बल्कि एक गंभीर और अमानवीय हत्या का मामला है, इसलिए कोई राहत नहीं दी जा सकती। वकील ने आत्मसमर्पण से छूट की मांग करते हुए कहा था कि बलजिंदर ऑपरेशन सिंदूर का हिस्सा रहा है और पिछले 20 साल से ब्लैक कैट कमांडो के रूप में राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात है। ये सुनते ही जस्टिस भुयान ने साफ कहा कि इससे आपको घरेलू अत्याचार करने की छूट नहीं मिल जाती। यह तो दिखाता है कि आरोपी शारीरिक रूप से कितना सक्षम था और किस तरह से उसने पत्नी की गला घोंट कर हत्या की। पीठ ने कहा कि यह 6 महीने या 1 साल की सजा जैसा मामला नहीं है, जहां छूट दी जा सके। जस्टिस चंद्रन ने कहा कि हाईकोर्ट ने आपकी अपील खारिज कर दी है। आप सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ विशेष अनुमति के लिए आए हैं। हम एसएलपी पर नोटिस तो जारी कर सकते हैं, लेकिन आत्मसमर्पण से छूट नहीं देंगे। कोर्ट ने कहा कि हम आत्मसमर्पण से छूट की मांग खारिज करते हैं। विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी किया जाता है, जिसकी अगली सुनवाई छह हफ्ते बाद होगी। याचिकाकर्ता को आत्मसमर्पण के लिए दो सप्ताह की मोहलत दी गई है। बताते चलें कि जुलाई 2004 में अमृतसर की एक अदालत ने बलजिंदर सिंह को दहेज हत्या में दोषी ठहराया था। यह वारदात 18 जुलाई 2002 को हुई थी, जब उसकी शादी को सिर्फ दो साल हुए थे। मृतका के भाई और भाभी ने अदालत में गवाही दी थी कि जब वे सुबह 9 बजे उसकी ससुराल पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि बलजिंदर और उसके पिता मिलकर उसकी पत्नी का गला चुन्नी से घोंट रहे थे, जबकि सास और ननदें उसके हाथ-पैर पकड़े हुए थीं। जांच में सामने आया था कि मृतका की मौके पर ही मौत हो गई। सुनवाई में चार सह-आरोपियों को बरी कर दिया गया, लेकिन बलजिंदर को दोषी ठहराया गया। हाईकोर्ट ने अपील लंबित रहने तक उसकी सजा पर रोक लगा दी, जिसके चलते वह करीब 17 साल से जेल से बाहर था। मई 2025 में हाईकोर्ट ने अंतिम फैसला देते हुए उसकी अपील खारिज कर दी और सजा बहाल रखी।